मेरे स्वप्न पर निबंध 500,300,1000 शब्दों में : My Dream Essay in Hindi

मानव – जीवन भी एक अजीव विचित्र पहेली है । मनुष्य इस विषय में रह – रहकर अपनी अधिक से अधिक इच्छाओं की तृप्ति करने का प्रयास करता है , परन्तु जिन अभावों की पूर्ति मनुष्य अपने दैनिक जीवन में नहीं कर पाता , उनकी पूर्ति वह स्वप्न अथवा कल्पना के जगत् में भ्रमण करके करता है । इस प्रकार कल्पना अथवा स्वप्न के लोक में अपने अभावों की पूर्ति देखकर वह फूला नहीं समाता , हर्ष से गद्गद् हो जाता है , चाहे उसके वे स्वप्न कभी पूरे हों या न हों । आज हम सब इस पोस्ट में मेरे स्वप्न पर निबंध (My Dream Essay in Hindi) के द्वारा समझेंगे।  

हाँ , तो उस रात्रि में काल्पनिक बिहार अत्यन्त ही नयनाभिराम था। पावस की मनोहर रात्रि थी , विधु जलध – टुकड़ियों के साथ अठखेलियाँ कर रहा था । उसकी शीतल किरणें वृक्ष – दलों पर उल्लासपूर्ण नृत्य प्रदर्शित कर रही थीं। हरी दूब पर दौड़ती हुई चाँदनी के पीछे अन्धकार में दबे पाँव चलकर और झटककर उसे पकड़ने का प्रयत्न कर रहा था । विश्व नीरवता की गोद में पड़ा रंगीन स्वप्न देख रहा था और ऐसे सुरम्य वातावरण में चातक मेघों की आराधना कर रहा था।

My Dream Essay in Hindi
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उसे इतना अवकाश कहाँ कि वह प्रकृति की इस मन मोहक छटा में स्वयं को भी लवलीन कर सके अथवा शैवालिनी की वारि – धारा और तट का प्रेम अभिनय देख सके । किन्तु उसके उपास्यदेव वारिद को उससे विशेष ममता न थी । वे तो शशि के साथ खेलकर मृदुल हास हँस रहे थे । अन्त में चातक से न रहा गया और उसने पिउ – पिउ कर कहा- ” हे उपास्यदेव ! मैं बारहों मास पुकार कर तुम्हारी अनन्त साधना करता हूँ और तुम हो कि सुनते ही नहीं , तुम्हें प्रसन्न करने के लिए क्या यह पर्याप्त नहीं , आराध्य!

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“प्रकृति के ऐसे सुरम्य , मनोहर वातावरण की छटा को निहारते – निहारते रात के दस बज गये। मैं खाट पर पड़ा था। एकाएक मुझे निद्रा ने अपने आगोश में ले लिया और मैं स्वप्नों के संसार में आगे बढ़ा। मैंने देखा , कुछ डाकू मेरे कमरे में प्रवेश कर गये हैं। वे मेरे घर की खोजबीन कर रहे हैं, मैं चुप रहा और अपने मन में सोचा, यदि मैं चिल्लाता हूँ तो मौत निश्चित ही है और यदि मौन रहता हूँ तो ये निर्दयी मेरे सारे सामान को बाँधकर ले जायेंगे । फिर मुझ जैसे निर्धन को भारी विपत्ति का सामना करना पड़ेगा।

मैंने सोचा कि इन्हें समझाऊँगा कि आप लोग मुझ सुदामा की कुटिया में क्या देख रहे हैं, यहाँ पर तो तन्दुलों के अतिरिक्त तुम्हें और मिलेगा भी क्या ? मैं इन विचारों के साथ खिलवाड़ कर ही रहा था कि एक डाकू मेरे समीप आकर बोला, ” सब धन कहाँ है ? शीघ्रातिशीघ्र बताओ , नहीं तो मौत के घाट उतार दिये जाओगे।

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” मैंने कहा, ” धन ? क्या तुम धन और रुपया  यहीं पर खोजने आये हो ? निर्धनों की झोंपड़ियों में तो भूख की ज्वाला से तड़पते हुए मासूम बच्चे मिल सकते हैं रोजी एवं रोटी की समस्या से आक्रांत कराहते हुए मजदूर मिल सकते हैं। चिथड़ों में अपनी लज्जा को छिपाये हुए अनेक द्रौपदी मिल सकती हैं। ” डाकू ने कहा ” चुपचाप सब धन बता दो अन्यथा तुम्हें मेरी गोली का शिकार होना पड़ेगा । मैं अधिक देर तक राह नहीं देख सकता। ” मैंने दुःखित स्वर में कहा कि, “यदि मुझ निर्धन को मारकर ही तुम्हें धन की प्राप्ति हो जावेगी तो मेरी छाती सहर्ष तुम्हारी गोली को सहने के लिए तैयार है।

“परन्तु याद रखना मैं सत्य कहता हूँ कि मेरी मृत्यु के पश्चात् तुम्हें गुदड़ियों के अतिरिक्त इस झोंपड़ी में और कुछ हाथ न लगेगा। मुझे मृत्यु का भय लेशमात्र भी नहीं है। विश्व में जिसने जन्म लिया है , उसका मरण भी निश्चित है। फिर मृत्यु से भय कैसा ? वह तो अनिवार्य है, अवश्यम्भावी है । पर एक बात सदैव याद रखना, तुम्हें परमपिता परमेश्वर के समक्ष यह उत्तर देना होगा कि तुमने एक निर्ब गाल पर अत्याचार क्यों किया? धिक्कार है तुम्हें तथा तुम्हारी काली करतूतों को।

तुमने अपने वंश का नाम डुबो दिया, पूर्वजों की शान को मिट्टी में मिला दिया। तुम्हारे बाबा, दादा तो डाका डालते समय अमीर – गरीब का सदा ध्यान रखते थे , वे विचार कर डाका डालते थे कि कहीं हमारे हाथों से किसी कंगाल का खून न हो जाय , क्योंकि ऐसा करने से उनके बच्चे, भूख की ज्वाला से तड़प – तड़प कर मर जायेंगे। परन्तु एक तुम हो , जो कि स्वार्थवश गरीबों के गले पर छुरी चला रहे हो , उन्हें लूटने के लिए उद्यत होकर अपनी शान समझ रहे हो।

मुझे परवाह नहीं ; मार दो मुझे गोली से ; परन्तु एक बात स्पष्ट कह देना चाहता हूँ कि गरीबों की आह से तुम जीवन पर्यन्त सुख का भोग नहीं कर सकते , क्योंकि जब मरी खाल की श्वास से लोहा तक भस्म हो जाता है तो तुम स्वयं ही अनुमान लगा सकते हो कि एक जीवित मनुष्य की आह जो उसके दुःखी हृदय से निकलेगी तुम्हारा सर्वस्व ही नष्ट कर देगी। मानव हृदय तो कोमल होता है, वह दया, सहानुभूति तथा प्रेम से परिपूर्ण होता है, आखिर तुम लोग भी तो मनुष्य का हृदय रखते हो।

यदि परिस्थिति तथा समाज उन्हें ऐसा करने के लिए बाध्य करते हैं तो इसमें दोष किसका ? मेरे स्वप्न पर निबंध  (My Dream Essay in Hindi) उनका ? समाज का ? अथवा ” हमारा तथा आपका ? * डाकू मेरे आर्तस्वर को सुनकर बोला , ” अच्छा अब हम जाते हैं। हमारी इच्छा है कि तुम कंगाल ह , धन के अभाव में अनेक कष्ट सहन कर रहे हो इसलिए कुछ धन तुम्हें दे जाएँ।

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“मैंने कहा, नहीं कौन कहता है कि मैं निर्धन हूँ। जब ईश्वर ने मुझे हाथ – पाँव दिये हैं तो मुझे कायर बनकर दूसरे के धन की अभिलाषा क्यों करनी चाहिए ? मैं मेहनत मजदूरी करके अपने उदर की पूर्ति कर लेता हूँ। मुझे संसार में किसी से शत्रुता नहीं तथा मैं यह भी सोचता हूँ कि मेरा भी कोई शत्रु नहीं। तुम भी मनुष्य ह , तुम भी मेहनत – मजदूरी करके अपना पेट भर सकते हो तो फिर इन राक्षसी कृत्यों को करके अपने जीवन को पापों से क्यों बोझिल बनाते हो ? ईश्वर के यहाँ तुम्हें उत्तर देना पड़ेगा कि तुमने दूसरे की कमाई को क्यों अपहरण किया ?

डाकू ने जब मेरे ये शब्द सुने तो कहा ” बेटा मैं भी एक अच्छे बाप का बेटा हूँ , पिता की मृत्यु के पश्चात् मेरी सारी सम्पत्ति समाज के ठेकेदारों ने पानी की तरह नष्ट करवा दी । मैंने सहायता के लिए समाज के समक्ष हाथ फैलाये , घर – घर भटका , परन्तु किसी ने भी शरण नहीं दी । जब मैंने अपने नादान शिशुओं को भूख से बिलखते देखा तो मुझसे रहा नहीं गया और मैं डाका डालने के लिए विवश हुआ। “

 

निष्कर्ष

मेरे स्वप्न पर निबंध  My Dream Essay in Hindi इस निबंध से हमें यहीं शिक्षा मिलता हैं की हमें कभी भी चोरी नहीं करनी चाहिए। चाहे कोई भी परस्थिति हो अपने मेहनत के बल पर कमाया हुआ धन ही काम आता हैं। चोरी एक अभिशाप हैं इससे लोगो के बिच में गलत मैसेज जाता है, तथा चोरी करने वाले के लिए समाज कभी भी साथ नहीं देता हैं। वह व्यक्ति समाज में कभी नजर उठाकर नहीं चलता हैं।

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